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    (सम-सामयिक विषयों की मासिक पत्रिका, RNI No.-50756)

    Thursday, 9 March 2017

    नवोदित हस्ताक्षर : सुरेश जी पत्तार 'सौरभ' और अरविन्द दाँगी "विकल"


    नवोदित हस्ताक्षर
     



    हिन्दी सब तक पहुंचे, सर्व-सुलभ हो। हम प्रत्येक जन को हिन्दी व्यवहार केलिए प्रेरित कर सकें, यह हमारा महती लक्ष्य होना चाहिए। मुझे एक अवसर का ध्यान आता है। मैं हिन्दी की पत्रकारिता की मुख्य धारा को छोड़ कर एक सरकारी संस्थान में हिन्दी प्रचार-प्रसार का काम देखने पर नियुक्त हुआ। शायद नब्बे के दशक की बात है, मैं चेन्नई किसी निरीक्षण पर था, वहीं आदरणीय डॉ महेश गुप्त जी जो कि राजभाषा विभाग के निदेशक थे भी चेन्नई किसी निरीक्षण में पहुंचे हुए थे। मुझे देखते ही उन्हों ने मेरा हाथ पकड़ कर घसीट लिया और बोले तुम मेरे साथ ही रहोगे।

    मेरे पिताजी के सहयोगी रह चुके थे वे। पिता के समान थे मेरे लिए। मैं मना कैसे कर सकता था। मैं पूरे दिन उनके साथ विभिन्न आयोजनों में रहा। उत्तरी आर्कोट में रेल फैक्ट्री गए, जहां मुख्य अतिथि नवाब आर्कोट थे। मैं आपको बता दूँ, डॉ साहब इंजीनियर हैं पर विशुद्ध हिन्दीवादी। शाम को कार्यक्रम से लौटते हुए मुझ से बोले सुधेन्दु!! देखते हो हिन्दी की क्या स्थिति हो गई है आज कल?’

    क्या हुआ?’ मैंने कौतूहल से पूछा।

    देखो आज कल ये ज़ी चैनल वाले समाचारों में प्रवक्ता शब्द नहीं बोल सकते, स्पोक्समैन बोलते हैं।

    इसमें बुराई क्या है।

    नहीं! हिन्दी भाषा के समाचार में अङ्ग्रेज़ी शब्द नहीं आने चाहिए। उनका आग्रह था।

    पर हम इस बात के हामी हैं ना कि हिन्दी सरल होनी चाहिए?’

    हाँ! पर इसका मतलब यह तो नहीं...

    हम हिन्दी में सैकड़ों अरबी, फारसी शब्दों को उर्दू के तौर पर इस्तेमाल में लाते हैं ना.... वे मेरे आशय को समझ गए। फिर आगे हमने इस विषय पर बात नहीं की।

    मित्रों, यह संस्मरण इस लिए लिखना पड़ा कि, हमें हिन्दी के प्रयोग को हर हालत में आगे बढ़ाना चाहिए। कोई नवोदित हिन्दी में लिख रहा है-पढ़ रहा है तो उसे सहारा देना चाहिए। कल वह हिन्दी उपयोग में सक्षम हो जाएगा तो आपके सहयोग को याद रखेगा, हिन्दी वर्तनी संबंधी त्रुटियों को वह उपयोग करते-करते दूर कर लेगा।

    इसी क्रम में मैं दो नवोदित हिन्दी कवियों को मैं पत्रिका में स्थान देरहा हूँ कि आप में से कोई हिन्दी प्रेमी उन्हें अपने साथ कर ले और उनको इस विधा को सँवारने में मदद प्रदान करे।

    पहले हैं श्री सुरेश जी पत्तार, M.A.,M.phil.,P.hD, कर्नाटक (बागलकोट) के रहनेवाले हैं। उनकी रचना होली है।

    मैं कविता और उसकी वर्तनी पर नहीं जा रहा हूँ.....उनके हिन्दी में लिखने के हौसले का उत्साहवर्धन होना चाहिए।

    प्रस्तुत है उनकी यह पहली प्रकाशित रचना। आप सभी पाठकों से अनुरोध है कि आप उन्हें हिन्दी के उपयोग से हतोत्साहित नहीं करते हुए उनका मार्ग दर्शन करेंगे :


    मानव मन एक विश्व है
    मन भाव अनेक भरे हैं
    काम, क्रोध, लोभ, मोह सब
    मानव वस्त्र सम धरे हैं।।

    जग रंगीले रंग भरा
    चंचलित मनुज फिरता है
    मन के रंगील भावों
    मानव मंथन करते हैं।।

    दशहरा, दिवाली, होली
    हर त्योहार खास होता
    दिवाली तम गुण हराता
    दशहरा दुर्गुण जलाता ।।

    आया रे होली भाई
    चल काम दहन कर लेते
    मन वासना मुक्त कर के
    शुद्ध भाव रंग खेलतें ।

    आत्म शुद्धी की जोश में
    रंग सींच खुशी मनाए
    शोभित निष्कल्मश रंगों
    मन मधुर मधुबन बनाएँ।।

    मोल करे त्योहार धेय
    संस्कारों को हम पाए
    मन शद्धी अनमोल रहा
    संस्कार पीछा कराए।

    न करे कभी दुर्व्यवहार
    संस्कृति अपनी बलिहारी
    विश्व में हम सर्वोपरी
    पाल-पोषण रहे जारी।।


    सुरेश जी पत्तार 'सौरभ'

    सुरेश जी पत्तार M.A.,M.phil.,P.hD
    कर्नाटक(बागलकोट)
    मो:9008904546


    इसी क्रम में दूसरे कवि हैं अरविन्द दाँगी "विकल", M.A. हिन्दी साहित्य एवं B.E. मैकेनिकल इंजिनियरिंग, पता - बागली, देवास - मध्यप्रदेश 455227 फोन 9165913773


    नारी तुम ममता की सागर तुम रणचंडी जीवन संचार हो...



    नारी तुम अधिकार नहीं,

    तुम तो जीवन का आकार हो...

    नारी तुम अबला नहीं,

    तुम तो सबल अपार हो...

    नारी तुम विवश और नहीं,

    तुम तो जननी संसार हो...

    नारी तुम अब क्रंदन नहीं,

    तुम तो प्रकृति को उपहार हो...

    नारी तुम कमतर नहीं,

    अब तुम तो शक्ति परम प्रतिकार हो...

    नारी तुम केवल नवरात्रि की नहीं,

    तुम तो पुज्यनीय हर वार हो...

    नारी तुम बच्चों की मशीन नहीं,

    तुम तो जीवन की सृजनहार हो...

    नारी तुम अब बंदिशों में नहीं,

    तुम मुक्त गगन आकाश हो...

    नारी तुम ममता की सागर तुम रणचंडी जीवन संचार हो...



    सुधेन्दु ओझा
    प्रमुख संपादक-संपर्क भाषा भारती

          

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