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    (सम-सामयिक विषयों की मासिक पत्रिका, RNI No.-50756)

    Thursday, 16 March 2017

    और नीरज जी के दाँत (व्यंग्य)


    दाँत और नीरज जी के दाँत (व्यंग्य)


    मानव शरीर के बहुत से अंगों के संस्कृत भाषी शब्दों को प्राचीन काल से ही विश्व में बिना किसी भेद-भाव के अपना लिया गया था। मुख-माउथ, नासा-नोज, हस्त-हैंड, पद-पैड-पॉड, नृ-न्यूरो, अक्ष-आइज़, दंत-डेंटल इत्यादि-इत्यादि। दंत भी संस्कृत का शब्द है। व्यक्ति के मुखड़े की सुंदरता बहुत कुछ दंत या दाँत पंक्ति पर निर्भर रहती है। मुँह खोलते ही 'वरदंत की पंगति कुंद कली' सी खिल जाती है, मानो 'दामिनि दमक गई हो' या 'मोतिन माल अमोलन' की बिखर गई हो। दाड़िम सी दंतपक्तियाँ सौंदर्य का साधन मात्र नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिये भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

    “सोने से पहले जरा मेरे नकली दाँत संभाल देना!” यह संवाद किसी बूढ़े दंपत्ति के बीच हो तो चलेगा तो क्या दौड़ेगा। किन्तु जब ऐसी स्थिति सुहागरात को आई तो संवाद का चाहे जो हुआ दुल्हन तो भाग ली।

    जी हाँ, देखभाल कर चुने गए इस वर से कई बार मिलने पर भी दुल्हन या उसके परिवार वालों को जरा भी शक नहीं हुआ कि दूल्हे मियाँ नकली चीजें फिट करवाकर ही इतने टिप टॉप नजर आ रहे हैं।

    सुहागरात को सबसे पहले दूल्हे ने अपना विग उतारकर रखा। दुल्हन ने सब्र कर लिया। सोचा होगा देर सबेर लगभग सभी पति गंजे तो हो ही जाते हैं तो चलो आज ही सही। किन्तु जब उन्होंने अपने नकली दाँत भी निकाल डाले तो उसने वहाँ से भाग निकलने में ही अपनी भलाई समझी।

    दुल्हन ने जिस युवा से सगाई की थी वह कुछ क्षणों में ही दंत व बालविहीन प्रौढ़ में परिवर्तित हो जाएगा इसकी तो उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।

    एक पुस्तक में पढ़ रहा था कि श्री लंका में महात्मा बुद्ध का एक मंदिर है जहां बुद्ध का दाँत सुरक्षित रखा हुआ है। बुद्ध की जब मृत्यु हुई तो उनके दाँत शिष्यों द्वारा लूट लिए गए। ईसापूर्व 483 में बुद्ध के परनिर्वाण के बाद उनके शिष्य केमो थेरो ने उनके मृत शरीर से सारे दाँत निकाल लिए। केमो थेरो बहुत जतन से उन दांतों को कलिंग शहर ले गया। जिसके चलते कलिंग को दँतपुर भी कहा जाने लगा। सन 411 में किसी प्रकार से बुद्ध का यह दाँत तरह-तरह की बाधाओं को पार करता हुआ श्री लंका पहुंचा। लगभग 900 वर्षों बाद बहुत जद्दो-जहद के बाद भारतीय व्यापारी इसे फिर देश में वापस लाने में कामयाब हुए। यह लगभग 1315 ईस्वी की बात है।

    ऐसा उल्लेख मिलता है कि तृतीय प्रहरमाबाहु नाम के बौद्ध सन्यासी इसे फिर श्री लंका ले जाने में सफल हुए। इस दाँत को छिपा कर रखा गया था। सिंहल पर उन दिनों पुर्तगाल का शासन था। सन 1560 में बोंबेट पुर्तगालियों को इस बात की खबर लग गई। उस दाँत को उन्होंने ताक़त के बल पर लूट लिया। डॉन कोन्स्टेंटाउन डी ब्रगांजा नामक बोंबेट पुर्तगाली इस दाँत को लेकर गोवा पहुंचा। यहाँ, अंग्रेज़ गवर्नर और उसके मंत्रिमंडल के सदस्यों के सामने महात्मा बुद्ध के दाँत को जला कर नष्ट कर दिया गया।

    इस घटना से आहत होकर विक्रमबाहु नामक बौद्ध सन्यासी ने हाथी दाँत से महात्मा बुद्ध का एक नकली दाँत तैयार करवाया। यह विशालकाय दाँत मनुष्य के शरीर में नहीं लग सकता। पर श्री लंका में आज भी इस दाँत की पूजा की जाती है।

    कहीं यह भी पढ़ा है कि मोनालिसा गंभीर प्रकृति की रोनेवाली मनहूस पर धनाढ्य महिला थी। लियोनार्डो ने उसका चित्र बनाने की पेशकश की तो वह न केवल तैयार होगई बल्कि लियोनार्डो को पैसे से भी मदद पहुंचाई। उसके सारे दाँत टूटे हुए थे, वह नकली दाँत लगाती थी। जब लियोनार्डो मोनालिसा का चित्र बनाता तो मोनालिसा सामने बैठी रहती और कई जोकर यह प्रयास कर रहे होते कि किस प्रकार उसके होंठों पे मुस्कान आजाए। कई बार ऐसा भी होता था कि वह इतना ज़ोर से हँसती कि उसके दाँत मुंह से छिटक कर दूर जा गिरते थे। यही कारण है कि लियोनार्डो उसे मोहक मुस्कान देने में कामयाब हुए।

    भला हो इन्टरनेट का दांतों को लेकर एक रोचक खबर चीन से पढ़ने को मिली चीन के गुवांगयान प्रांत में रहने वाली 85 साल की जैंग को अपने नकली दांत पाने की जद्दो-जहद काफी महंगी प़ड़ी। दरअसल एक दिन जैंग घर में अकेली थी और बाथरूम में अपने नकली दांतों को साफ कर रही थीं। तभी दांत उनके हाथ से फिसल कर टॉयलेट सीट में जा गिरा। जिसे पाने के लिए जैंग ने बिना कुछ सोचे समझे नकली दांतों के सेट को निकाल बाहर करने के लिए टॉयलेट सीट के अंदर ही अपना बाजू घुसा दिया। इसके बाद जो हुआ वो हादसा जैंग कभी नहीं भुलेगी।

    उन्हें लगा कि दांत उन्हें ब़डी जल्दी मिल जाएंगे लेकिन टॉयलेट सीट में ही उनका हाथ फंस गया। उनकी स्थिति ऎसी हो गई कि अपना हाथ बचाने के लिए वो टॉयलेट के ऊपर लेट तक गई, पर किसी भी पोजिशन के बाद भी वो हाथ बाहर निकालने में असमर्थ ही रहीं। इसके बाद तो उनकी असली मुसीबत शुरू हुई। उनके परिवारवाले बाहर कहीं गए हुए थे। वो चार घंटे बाद ही लौटने वाले थे।

    अब दादी अगर चिल्लाती भी तो कोई उनकी सुनने वाला नहीं था। ऎसे में चार घंटों तक उनके हाथ टॉयलेट सीट में ही फंसे रहे। चार घंटे बाद जब उनके परिवारवाले लौटे तो दादी को टॉयलेट के अंदर और सीट के ऊपर लेटा देख वो चकित हो गए। दादी ने पूरा माजरा बताया और उन्हें वहां ये बाहर निकालने की गुजारिश की। काफी देर बाद फायरफाइटर्स वहां पहुंचे और दादी के हाथों को टॉयलेट सीट तो़डकर बाहर निकाला।

    दाँत के मोह की कथा में मेरे भी कुछ संस्मरण हैं।

    आज से लगभग एक दशक पूर्व की बात है, कवि गीतकार आदरणीय गोपाल दास सक्सेना नीरज जी का कार्यक्रम प्रस्तावित था। चूंकि कार्यक्रम का संचालन मेरे पास था अतः उनके रहने इत्यादि की व्यवस्था भी मेरे ऊपर थी। कार्यक्रम देर रात तक चला। बहुत सफल रहा।

    कार्यक्रम के पश्चात मैं नीरज जी को गेस्ट हाउस में लेकर आया। यहाँ रात बिताने के बाद अगली सुबह वे अलीगढ़ के लिए रवाना होते।

    गेस्ट हाउस में नीरज जी केलिए पूरी व्यवस्था थी। रात काफी हो चली थी सो मैं उन्हें प्रणाम कर के निकल लिया।

    अगले दिन मैं मुँह-अंधेरे ही निश्चित समय पर गेस्ट हाउस पहुँच गया। नीरज जी ने दरवाजा खोला।

    धीरे-धीरे वे तैयार होने लगे। आयु अधिक हो चली थी इसीलिए हर कृत्य केलिए समय लग रहा था। अंततः वे पूर्ण-रूपेण तैयार हो गए। गेस्ट हाउस छोड़ने से पहले उन्हें ध्यान आया कि वे अपने दाँत मेज पर रख कर सोए थे। वो दाँत कहाँ गए। अब मैं और सहयोगी नीरज जी के दाँत खोजने में लग गए। नीरज जी ने भी अपना ब्रीफ़केस पलट दिया पर दाँत वहाँ हो तो मिले। हम लोग भी उनके कमरे का चप्पा-चप्पा खोज रहे थे पर नीरज जी के दाँत का कहीं पता न चला। इन सब खोज-बीन के दौरान नीरज जी जब-तब यह कह देते थे कहाँ गए साले को रखा तो मेज़ पर ही था। अंततः जब आधे घंटे की खोज के बाद भी दाँत नहीं मिले तो नीरज जी ने आजिज़ आकर कहा रहन दो स्सालों को मारो गोली। चूहे कहीं घसीट ले गए होंगे।
    इसके बाद ही काफिला अलीगढ़ को निकला।

    दांतों की इस महान परंपरा का स्मरण कर यही लग रहा है कि अन्य महापुरुषों के दाँत की भी विशेष कीमत होगी। जिनके टूट गए हैं उनकी तो कोई बात नहीं, जिनके नहीं टूटे हैं, उनके दाँत तोड़ कर राष्ट्रीय दंत संग्रह में अवश्य रख लिए जाने चाहिए।


    सादर.....
    सुधेन्दु ओझा


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