• Breaking News
    Loading...

    मुख्य संपादक : सुधेन्दु ओझा

    मुख्य कार्यालय : सनातन समाज ट्रस्ट (पंजीकृत), 495/2, द्वितीय तल, गणेश नगर-2, शकरपुर, दिल्ली-110092

    क्षेत्रीय कार्यालय : सी-5, UPSIDC इंडस्ट्रियल एरिया, नैनी, इलाहाबाद-211008, (Call :- 9650799926/9868108713)

    samparkbhashabharati@gmail.com, www.sanatansamaj.in

    (सम-सामयिक विषयों की मासिक पत्रिका, RNI No.-50756)

    Friday, 3 March 2017

    खुला पत्र हिंदुओं के नाम : कृपया इसे अधिसंख्या में शेयर करें

    हिन्दू समाज को जीवित रखने के लिए यह करना होगा


    प्रिय तथाकथित हिन्दू जन,


    मुझे क्षमा करें कि मैंने आपके सम्बोधन से पहले तथाकथित का प्रयोग किया है। आप में से अधिकांश पीड़ायुक्त सम्बोधन का मर्म समझ गए होंगे।
    एक समय था आप पूरी धरा पर थे।
    आज बौद्ध, जैन, सिख, निरंकारी और जाने किन-किन संप्रदायों में बंट कर एक छोटे से भू-भाग में सिमट कर रह गए हैं।
    आने वाला समय भी आप केलिए उज्ज्वल नहीं है। सन 2015 में किसी सभा में बोलते हुए स्वर्गीय अशोक सिंघल जी ने कहा था कि उन्हें स्वप्न आया है कि वर्ष 2020 तक हिन्दू धर्म विश्व का नंबर एक धर्म होगा।
    मैंने उन के इस वक्तव्य को एक अफीमची की पीनक बतलाया था और विरोध में कहा था कि इस तरह के मादक और तर्कहीन बयान देकर वे हिन्दू समाज को और अशक्त कर रहे हैं।
    कुछ दिनों बाद ही वे स्वर्गवासी हो गए। मन तो नहीं था किन्तु वे आदरणीय पुरुष थे सो उनकी श्रद्धांजलि सभा में आईपी स्टेडियम गया था। उनको मेरी श्रद्धांजलि थी, विरोध भी था।
    उन दिनों मैं 'सनातन समाज की नई संहिता' पुस्तक लिख रहा था।
    हिन्दू अपने घर में ही निर्वासित होने की तैयारी में हैं। कश्मीर से खदेड़ दिए गए हैं, मुख्य भू-खंड से भी आनेवाले 80 से 100 सालों में बे-दखल कर दिए जाएंगे।
    कुछ लोग पूछते हैं उपाय क्या है?
    मेरा मानना है कि यह समय हिंदुओं केलिए आपात स्थिति की तरह है उन्हें कठोरतम निर्णयों को स्वयं के ऊपर लागू करना होगा। अपने समूह को जीवित रखने केलिए उन्हें इतिहास से सबक लेना पड़ेगा। इतिहास का सबक है कि ईसाई और इस्लाम धर्म ने अन्य धरमों के लोगों को अपने धर्म समूह में आमेलित कर अपने संख्या बल में विस्तार किया है। हमें भी यही करना पड़ेगा।
    पर यह होगा कैसे?
    हिन्दू अपने 75% हिस्से को द्विज अथवा पवित्र हिन्दू मानता ही नहीं, फिर विस्तार कैसा?
    यहीं हमें अपनी सोच को बदलना पड़ेगा। सर्व-प्रथम इन 75% अनुसूचित, जन और पिछड़ी जतियों में बंटे समूह को ब्राह्मण/क्षत्रिय/वैश्य के रूप में प्रथम तीन वर्णों में आमेलित करना पड़ेगा।
    उनके आरक्षण लाभ को सतत चलते रहने देना होगा। और उसका त्याग उनके स्वेच्छा और विवेक पर होगा।
    अपने परिवार के सदस्यों की संख्या में वृद्धि करनी होगी।
    मजबूरी में बहु-विवाह प्रथा को अपनाना होगा।
    कन्याओं को सुशिक्षित कर उनके विवाह इत्यादि में समाज को सहयोग करना होगा।


    मैं यहाँ कुछ विचारणीय बिन्दु आपके लिए छोड़ रहा हूँ - यदि आप ऐसा नहीं कर पाए तो आप हिंदुओं के क्षरण को कदापि रोक नहीं पाएंगे :


    हिन्दू समाज में जातीय समस्या को समाप्त करने पर लिखा और कहा तो बहुत गया किन्तु उसको धरातल पर उतारने के मात्र कुछ ही प्रयास देखने को मिले हैं। कुछ दिनों पूर्व राजस्थान में एक दलित अधिकारी ने राज्य सचिव नहीं बनाए जाने पर धर्मांतरण कर लिया। रोहित की आत्महत्या के मुद्दे की गूंज हैदराबाद से होते हुए दिल्ली तक आ पहुंची है, किन्तु क्या यह सब यहीं थम जाएगा? डॉ. भीम राव अंबेडकर के जाति उन्मूलन प्रयासों का परिणाम, क्या बौद्ध धर्मांतरण ही तय था? वर्तमान में ‘दलित आंदोलन’ क्या खेल ही बना रहेगा। क्या दलित, दलित ही बने रहना चाहता है? हिन्दू समाज के इन्हीं कुछ जीवंत, ज्वलंत और जटिल प्रश्नों को ‘सनातन समाज की नई संहिता’ पुस्तक में मैंने बहुत ही सरल और व्यावहारिक तरीके से सुलझाने का प्रयास किया है।
    जातीय समस्या पर उबाऊ, जटिल और पांडित्य प्रदर्शन करती हुई अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। किन्तु कोई पुस्तक इस समस्या के निदान तक नहीं पहुँच पाई। इन पुस्तकों की शुरुआत तो आदर्शमय होती है किन्तु निदान की पायदान से पहले ही ये दम तोड़ देती हैं। सच कहूँ तो हिन्दू धर्म में जाति व्यवस्था को अपनाते हुए भी उस से तथाकथित शूद्र वर्ण के उन्मूलन पर व्यावहारिक रास्ता दिखलानेवाली यह पहली पुस्तक प्रकाशित हुई है।
    आरंभिक पृष्ठों में ही मैंने अपने मन्तव्य को स्पष्ट करते हुए कहा है ‘इस पुस्तक की रचना किसी पुरस्कार, पारितोषक, मान, सम्मान हासिल करने के उद्देश्य से नहीं हुई है। समाज के एक वर्ग की अनंत काल की पीड़ा और वेदना के सागर से कुछ विचार माणिक्य निकाल कर इस पुस्तक को रचने का प्रयास हुआ है।‘
    देखा जाए तो हिन्दू समाज से जातीय दुराग्रह को समाप्त करने का गंभीर प्रयास धर्म के मठाधीशों द्वारा नहीं किया गया। कौन मूर्ख है जो जान बूझ कर अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारेगा? यदि धर्म में सम-भाव ले आए तो विभिन्न मत-मतांतरों के नाम की आपकी दुकान कैसे चलेगी? लेखक ने एक स्थान पर लिखा भी है ‘हमें सजग रहना होगा उन शक्तियों से जो एक चिर-परिचित शैली में धार्मिक परिसर में अपनी महंतशाही जमा कर बैठी हुई हैं। जैसे-जैसे इस पुस्तक का आलोक फैलेगा वैसे-वैसे आडंबर का प्रवचन कर रहे डेरे, समागम, संस्थाएं और ढेरों-ढेर मत-मतांतर अपनी संगठन शक्ति क्षीण होता हुआ पाएंगे। ‘सनातन समाज’ की तरफ खिसकते हुए अपने जनाधार से कुपित वे समाज के लिए अप्रिय स्थिति को जन्म देंगे और उसका दोष ‘सनातन समाज’ के सिर रखेंगे।‘
    सनातन समाज आखिर है क्या? :
    ‘सनातन समाज की नई संहिता’ में ‘सनातन समाज’ को लेकर कोई संदेह ना रह जाए इसलिए स्पष्ट करता चलूँ कि मेरा अभिप्राय आर्यों के उस आदर्शमय समाज की स्थिति है जिसमें समाज में केवल तीन समानोपयोगी वर्ण विकसित हुए थे। ये तीन वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य। ये तीनों वर्ण समाज में अपने-अपने वर्चस्व को बनाए रखने केलिए परस्पर द्वंद्व-रत नहीं रहे बल्कि इन्होंने एक वास्तविक उटोपिया की आज से हजारों वर्ष पूर्व रचना की थी। उस काल में समाज में विग्रह या फिर इन तीनों वर्णों में परस्पर टकराव नहीं था। इस समय तक आर्यों में चौथे वर्ण का अस्तित्व नहीं था। ‘सनातन समाज की नई संहिता’ के माध्यम से उन्हीं तीन वर्णों वाले समाज के ‘पुनर्संरचित समाज’ को ही ‘सनातन समाज’ कहा गया है।
    सनातन समाज के प्रमुख बिन्दु :
    हिन्दू अध्यात्म और देवी-देवताओं में आस्था :
    हिन्दू अध्यात्म जो कि सूक्ष्मता से मनुष्य के जीवन-मरण, उसके प्रकृति के साथ तादाम्य को विवेचित करता है, मुक्ति की राह बतलाता है जो विश्व का सबसे प्रबल निरपेक्ष ज्ञान है, वह समाज के सदस्यों केलिए पूज्य है। सदस्यों की तमाम हिन्दू देवी-देवताओं, ग्राम देवताओं, कुल माताओं/देवियों, पवित्र स्थलों में पूर्ण आस्था है।
    मात्र तीन वर्ण की हिन्दू समाज व्यवस्था : यह तो स्पष्ट ही है कि ‘सनातन समाज’ का प्राकट्य ही हिन्दू धर्म को तीन समानोपयोगी वर्णों तक सीमित करने के उद्देश्य को लेकर हुआ है।
    केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्ण : विश्व के प्रत्येक समाज में यही तीन वर्ण देखने को मिलेंगे। पहला, पुरोहित, आचार्य, शिक्षक। दूसरा, समाज का रक्षक, योद्धा, राजा। तीसरा, जो समाज केलिए अन्न, व्यापार इत्यादि से उसके भरण-पोषण की व्यवस्था का दायित्व उठाए। अतः, ‘सनातन समाज’ किसी अन्य वर्ण को हिन्दू धर्म में अस्वीकार करता है। ‘सनातन समाज’ में ये तीनों वर्ण परस्पर समानोपयोगी और समान सम्मान के पात्र हैं। वर्ण संघर्ष के ये कारक नहीं हैं बल्कि एक दूसरे के पूरक और परस्पर एक-दूसरे पर अन्योनाश्रित हैं।
    मनोवांछित वर्ण चयन की सुविधा :
    वर्ण चयन की स्वतन्त्रता : ‘सनातन समाज’ में सदस्यों को अपनी सदस्यता ग्रहण करते समय ही अपने वर्ण के चयन की भी, बिना किसी भेद-भाव के स्वतन्त्रता प्राप्त होगी। वे अपनी मनोवृत्ति अथवा किसी अन्य अनुकूलता को ध्यान में रख कर ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य वर्ण में से किसी भी वर्ण को चुन सकते है। 
    चुने गए वर्ण की मान्य अवधि पाँच वर्ष : चूंकि हम जन्मगत वर्णक्रम को प्रोत्साहित नहीं करते इसलिए आरंभ में आपके द्वारा चयनित वर्ण की मान्य अवधि पाँच वर्ष की रहेगी जिसका तत्पश्चात इस वर्ण में सदस्यता का आनेवाले प्रत्येक पाँच वर्ष पर नवीकरण करवाया जा सकेगा।
    कोई चतुर्थ वर्ण नहीं अंत्यज नहीं, सभी द्विज : 
    हम किसी हीन समाज की स्थापना नहीं कर रहे हैं। ‘सनातन समाज’ का मूलाधार हिन्दू धर्म और अध्यात्म है इस धर्म से केवल लोक-अमंगलकारी तत्वों को हटा भर देने से यह विश्व का सबसे सशक्त समाज बन जाता है। यही प्राचीन ऋषि-मुनियों की आकांक्षा भी थी। सभी मनुष्य संस्कारयुक्त बनें, द्विज बनें।
    सब का उपनयन संस्कार : हिन्दू धर्म संस्कार का यह अनिवार्यतम सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। बिना इस संस्कार के ‘सनातन समाज’ की सदस्यता नहीं हासिल की जासकती।
    आरक्षण विरोधी नहीं : 
    ‘सनातन समाज’ उन्हें सरकार से मिल रहे आरक्षण इत्यादि के लाभ का पूर्ण समर्थन करता है।
    क्या अनुसूचित जाति/जन जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग से सनातन समाज में प्रवेश लेने वालों को विशेष लाभों/आरक्षण का त्याग करना होगा? इस का उत्तर भी पुस्तक में दिया गया है। जिसके अनुसार नए सदस्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य में से किसी भी एक वर्ण का चयन कर सकते हैं। किन्तु, वे भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जन जातियों को प्रदत्त विभिन्न लाभों को वैसे ही हासिल करते रहेंगे जैसा कि वे पहले से करते आ रहे हैं। वे ‘सनातन समाज’ में रहते हुए भी ऐसे लाभों का तब तक उपयोग कर सकते हैं जब तक कि वे उन्हें स्वेच्छा से त्यागने की स्थिति में ना आ जाएँ।
    नशा, जुआ, अपराध के त्याग पर बल : 
    ‘सनातन समाज’ में इन सब की वर्जना है। सदस्यों को निर्देश है कि वे इन वर्जनाओं से बचें और इन्हें बढ़ावा नहीं दें।
    सभी धर्मानुयायियों का स्वागत : 
    आप किसी भी धर्म को माननेवाले हों, कोई भी मतावलंबी हों, यदि आप ‘सनातन समाज’ की विचारधारा से प्रभावित होकर इसमें प्रवेश को इच्छुक हैं तो इस समाज में आप शामिल हो सकते हैं।
    पुरुषों को तीन विवाह की स्वीकृति : 
    मेरे मतानुसार ‘सनातन समाज’ के विकास तथा हिन्दू समाज में उत्पन्न कन्या-भ्रूण हत्या की विसंगति को दूर करने के लिए यह आवश्यक माना गया है कि ‘सनातन समाज’ में पुरुषों को अपनी परिस्थिति और पारिवारिक आवश्यकता के अनुकूल अपनी समस्त पत्नियों की लिखित सहमति प्राप्त करते हुए हुए तीन विवाह की अनुमति है।
    इस पर बहुत लोगों को आपत्ति होगी किन्तु मैंने यह निर्णय जो समाज पर लागू किया है उसका आप बिना विरोध के अनुपालन करें, यह राष्ट्र हित का निर्णय है।
    कन्याओं के विवाह का दायित्व समाज का : 
    नारियां ‘सनातन समाज’ की बहुमूल्य धरोहर हैं। स्वभावगत ये काया, मन, निश्चय, से मातृवत, निश्छल और कोमल होती हैं जिसकी वजह से उन्हें पुरुषों के मुक़ाबले आसानी से छल-कपट का शिकार बनाया जा सकता है। उन्हें सबल तो करना ही है साथ ही साथ उन्हें सुरक्षा भी प्रदान करनी है।
    ‘सनातन समाज’ की इस दिशा में एक विशेष सोच है। सदस्यों को निदेश है कि वे पुत्रियों की समुचित शिक्षा का प्रबंध करें। भविष्य में उनके विवाह पर होने वाले व्यय को लेकर चिंतित ना हों। कन्याओं को परिवार के ऊपर बोझ की तरह से न ग्रहण करें। ‘सनातन समाज’ समस्त कन्याओं के विवाह के व्यय की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेता है।
    हर विवाह योग्य कन्या को समुचित दान-दहेज के साथ घर से विदा किया जाए यह ‘सनातन समाज’ का लक्ष्य होगा।
    बेसहारा-निर्धन स्त्रियों पर ध्यान : 
    मेरा मानना है कि महिलाएं काया, मन, निश्चय, से मातृवत, निश्छल और कोमल होती हैं जिसकी वजह से उन्हें पुरुषों के मुक़ाबले आसानी से छल-कपट का शिकार बनाया जा सकता है। और यदि समय की मार से ये बेसहारा और निर्धन हों तो स्थिति और विषम हो जाती है। कुछ दुर्जन, ऐसी ही स्थिति की शिकार महिलाओं को पथभ्रष्ट कर देते हैं, उन्हें प्रलोभन के माध्यम से धर्मच्युत करने की कोशिश कर उनके शोषण का प्रयास करते हैं। इस स्थिति से ऐसी महिलाओं को बचाया जाए यह समाज का दृढ़ निश्चय है।
    स्त्रियों की आर्थिक सुरक्षा : 
    स्त्रियाँ अपने घर की खुशहाली के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। उनकेलिए उनका घर ही संसार है और वे अपने घर, परिवार और बाल-बच्चों को समृद्ध रखने केलिए हर समय प्रयासरत रहती हैं। वे कुशल श्रमिक भी होती हैं। यदि महिलाओं को आर्थिक विकास का केंद्र बनाया जाए तो परिवार स्वतः समृद्ध बनेंगे, इसी तथ्य को ध्यान में रख कर ‘सनातन समाज’ इनकी आर्थिक सुरक्षा के उपाय सुनिश्चित करेगा।
    प्राकृतिक सम्पदा और जल संरक्षण पर बल : मनुष्य स्वार्थवाश अपने विकास को तो प्राथमिकता देता है किन्तु उसके इस प्रयास से वन्य-जीवों, पक्षियों के आश्रय भरण-पोषण के स्त्रोत मिट रहे हैं, उनसे वह बेखबर है। ‘सनातन समाज’ का प्रत्येक सदस्य अपने जीवन काल में कम से कम सौ फलदार वृक्षों का रोपण, अपनी भूमि या फिर पास-पड़ोस की भूमि पर अवश्य ही करेगा। इन वृक्षों के फल बच्चों को तो तृप्त करेंगे ही, बचे हुए फल पर पक्षियों, गिलहरियों तथा अन्य जीवों का जीवन क्रम चलेगा। प्राकृतिक सम्पदा जिसमें जल भी शामिल है इसके अनाहूत दोहन से हमें बचना है।
    युवा शक्ति का अधिकतम सदुपयोग : 
    युवाओं में अतुलित सृजनशीलता होती है, वे परिवर्तन के हामी और आने वाले कल के उत्तराधिकारी होते हैं। यदि आपके युवा ही संस्कारहीन, शक्तिहीन, निस्तेज हैं, उनमें प्रातः स्मरणीय चंद्रशेखर, भगत सिंह, विवेकानंद, गांधी, सुभाष, खुदीराम बोस, जगदीश चंद्र बसु, सचिन तेंदुलकर, अज़ीम प्रेमजी, नरेंद्र मोदी बनने की ललक नहीं है तो समझिए आपके समाज के नेतृत्व में कहीं कुछ गड़बड़ है।
    अतः, ‘सनातन समाज’ अपनी युवा शक्ति की सृजनशीलता का सदुपयोग कर सके यह निरंतर प्रयास रहेगा।
    रक्षक दल का गठन : किसी आपदा से निपटने के लिए ‘सनातन समाज’ को पहले से ही पूर्णरूपेण तैयार रहना चाहिए। युवा, वरिष्ठ सदस्यों के ताल-मेल में इन स्थितियों में जूझने केलिए पहले से ही तैयार रहें।
    सगोत्र विवाह से बचाव : 
    सगोत्र विवाह, संतानों में कई प्रकार के विकार पैदा करता है। इन विकारों को आधुनिक चिकित्सा पद्धति भी नहीं सुधार सकती यह वैज्ञानिक तथ्य है। अपने ही परस्पर रक्त से उत्पन्न संतानों के इन्हीं विकारों से बचाने केलिए सगोत्र विवाह की ‘सनातन समाज’ में वर्जना है।
    सामाजिक न्याय व्यवस्था : 
    आज कल न्यायालयों में करोड़ों की संख्या में मामले लंबित हैं। ज्यूडीशियल डाटा ग्रिड द्वारा जारी आंकड़ों के हिसाब से देश के कुल 15 हज़ार न्यायालयों में वर्ष 2014 तक लगभग 3.07 करोड़ मामले लंबित पड़े हुए हैं। इन में से भी 28% मामले पाँच सालों से भी अधिक समय से लटके हुए हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया, दिल्ली, 12 अक्तूबर 2015)। लोग भूखे पेट, काम-धंधा छोड़ कर न्यायालय जाते हैं इस आशा में की उन्हें न्याय मिलेगा। शाम को लुटे हुए घर लौटते हैं, वकीलों की जेब भर कर। यह अंतहीन प्रक्रिया है। न्यायाधीशों के सामने ही न्यायकर्मी मुट्ठी गरम होते ही लंबी-लंबी तारीख दे देते हैं। निर्धनता की वजह से सरकारी ऋण का आप दस हज़ार रुपया नहीं लौटा पाओगे तो आप की कुर्की का आदेश आजाएगा। विजय मलाया जैसा उद्योगपति हजारों करोड़ रुपए का ऋण लेकर अपनी कुत्सित, कुंठित इच्छा पूरी कर नग्न युवतिओं के कैलेंडर छाप देगा, उसका कुछ नहीं होगा।
    सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था : 
    सामाजिक सुरक्षा के दो पहलू हैं। पहला तो वह है जिसमें ‘सनातन समाज’ के नए सदस्यों को ग्रामीण या अन्य क्षेत्रों में कुछ रूढ़िवादी आपराधिक किस्म के लोगों से प्रतिकार के रूप पेश आता होगा। जिसमें ‘अच्छा हम से बराबरी’ का भाव छुपा रहता होगा। दूसरा पहलू किसी भी कारण से ‘सनातन समाज’ के सदस्यों की आजीविका अथवा मर्यादा को क्षति पहुँचने के रूप में हो सकता है। ‘सनातन समाज’ की रक्षक दल और युवा टोलियों को इस स्थिति में महत्वपूर्ण किरदार निभाना होगा।
    आर्थिक उद्योग/व्यापार व्यवस्था : 
    आर्थिक उद्योग/व्यापार व्यवस्था का निर्माण इस प्रकार करना होगा ताकि इन गतिविध्यों से ‘सनातन समाज’ में रोजगार में वृद्धि हो सके और सदस्यों के जीवन में खुशहाली आए। ये गतिविधियां इस प्रकार की रहें जिस से ‘सनातन समाज’ की महिलाएं प्रच्छन बेरोजगारी से मुक्ति पाएँ और अपने बचे हुए समय और श्रम का उपयोग उत्पादकता में लगाएँ।
    ‘सनातन समाज’ उद्यमियों के उत्पाद का चिह्न बनाना : 
    इसी क्रम में यह प्रयास भी होना चाहिए कि ‘सनातन समाज’ के उद्यमी एक ऐसा लोगो (पहचान चिह्न) तैयार करवाएँ जिसे देखते ही ‘सनातन समाज’ के सदस्य को पता चल जाए कि इस उत्पाद का निर्माता ‘सनातन समाज’ परिवार का ही सदस्य है और उसे इस विषय में ज़्यादा पूछने की आवश्यकता ना रहे।
    पुष्प, फल, सब्जी पौधशालाओं, दुग्धशालाओं का निर्माण : ऐसे क्षेत्रों में जो कि किसी बड़े शहर के समीप हों समाज के सदस्यों द्वार पुष्प, फल, सब्जी पौधशालाओं, दुग्धशालाओं के उद्यम की तरफ बढ़ने का प्रयास होना चाहिए।
    शिक्षा व्यवस्था : 
    विद्यालय/विश्वविद्यालय की स्थापना : मैं पूर्व में कहता आया हूँ, शिक्षा मनुष्य जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसे कभी भी अपनी प्राथमिकता की सूची से बाहर न करें। समाज के समर्थवान सदस्यों से अनुरोध है कि वे अधिक से अधिक संख्या में आगे आकर अपने समाज के युवाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाएँ। यह उनका पुनीत कर्तव्य है। देश के हर ज़िले और तहसील में ‘सनातन समाज’ का एक विद्यालय निर्मित हो।
    स्त्री शिक्षा-उद्यम पर बल : 
    ‘सनातन समाज’ नारी को सबसे बहुमूल्य धरोहर मानता है साथ ही शिक्षा को जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि। यह स्वाभाविक ही है कि हम चाहेंगे कि हमारे समाज की हर महिला उच्च शिक्षा प्राप्त हो। शिक्षित महिला अपने परिवार और परिवेश में ज्ञान के दीपक की भांति प्रकाश फैलाएगी। इसमें सोने में सुहागा तब हो, जब महिलाएं अपने बचे हुए समय और श्रम को उत्पादक गतिविधि में लगाएँ। महिलाएं स्वयं, अपने मानदंडों के अनुरूप उद्यम के लिए प्रयासरत हों।
    सेवानिवृत्त सदस्यों को दायित्व : 
    सरकारी कार्यालयों से सेवानिवृत्त ‘सनातन समाज’ के सदस्य बहुमूल्य हैं। समाज को उनकी सेवाओं का लाभ उठाते हुए उन्हें ग्रामीण और जनपदीय क्षेत्रों में प्रचारक और न्यायपति की भूमिका में वरीयता प्रदान करनी चाहिए। ऐसे कार्यकर्ताओं को समाज द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न लोकोपकारी योजनाओं से जोड़ना चाहिए।
    वृद्धों का विशेष सम्मान और पवित्र वृद्धाश्रमों का निर्माण : वरिष्ठ नागरिक ‘सनातन समाज’ की मान और प्रतिष्ठा हैं। समाज उनकी दृष्टी से ही आगे बढ़ा है। उनकी क्षीणकाय अवस्था में उन्हें हमारे प्यार, स्नेह और देखभाल की ज़रूरत है। कई बार स्थितियाँ इस तरह विवश करती हैं कि उन्हें एकाकी रहना पड़ता है किन्तु ‘सनातन समाज’ के अंतर्गत उनकी सेवा-सुश्रुषा को हम अपना कर्तव्य मानते हैं। समाज का प्रयास रहेगा कि वे पवित्र हिन्दू स्थलों, नदियों के इर्द-गिर्द वृद्धाश्रमों का निर्माण करें जहां इन्हें परिवार की पूरी सहूलियतें उपलब्ध करा सकें।
    चिकित्सालयों/सामुदायिक भवनों का निर्माण : 
    चिकित्सालय, सामुदायिक भवन, विद्यालय इत्यादि बनाते समय ध्यान रखा जाए कि इन्हें बड़े और विस्तृत भाग में ही बनाया जाए अन्यथा इनसे लोगों में परेशानी और असंतोष ही बढ़ेगा। ज्योतिष, अंक शास्त्र, हस्त रेखा, वास्तु, रत्न विज्ञान को मान्यता : इन विधाओं को समाज मान्यता प्रदान करता है। तथा इन्हें अंध विश्वास की श्रेणी में नहीं रखता।
    जादू-टोने, गंडे-ताबीज़ का निषेध : 
    ‘सनातन समाज’ अंध-विश्वास को बढ़ावा नहीं देता। जादू-टोना और गंडे तथा ताबीज़ का समाज में कोई स्थान नहीं है।
    भ्रूण हत्या तथा बाल विवाह विरोधी : 
    ‘सनातन समाज’ भ्रूण हत्या और बाल विवाह का विरोधी है। सरकार द्वारा स्थापित अथवा संशोधित विवाह की आयु को समाज मान्यता प्रदान करता है।
    अहिंसा में विश्वास : 
    ‘सनातन समाज’ अहिंसा परमोधर्म: को स्वीकार करता है किन्तु जीवन के बचाव में हुई प्रतिहिंसा, वैदिक हिंसा के रूप में उचित मानता है।
    दस्तकारी व्यवसाय को ई-कॉमर्स से जोड़ना : 
    हमारे बहुत से शिल्पी, दस्तकार बांधवों के उत्पाद यदि ई-कॉमर्स से जुड़ जाएँ तो निश्चित ही उन्हें भी इसका लाभ मिलेगा और वे समृद्धशाली बनेंगे।
    राष्ट्रीय विधि-विधान में आस्था : 
    ‘सनातन समाज’ का भारत देश तथा विभिन्न राज्यों द्वारा स्थापित विधान में पूर्ण आस्था और विश्वास है।
    डॉ. भीम राव अंबेडकर : चतुर्वर्ण से होने वाले पहले शंकराचार्य
    डॉ. भीम राव जी अंबेडकर को बहुधा पुरातनपंथियों ने अपने-अपने रंग के चश्मे से देखा है। जिसकी वजह से उनके आकलन में उन्होंने भयानक भूल की है। डॉ. भीम राव अंबेडकर प्रचंड हिंदुत्ववादी विचारक थे, और हैं। उनकी धर्म के प्रति आस्था किसी शंकराचार्य से कमतर न थी।मेरी मान्यता के अनुसार वे तथाकथित चतुर्वर्ण से होने वाले पहले शंकराचार्य से कम न थे। ‘कई लोग प्रश्न करेंगे कि जिस डॉ. भीम राव अंबेडकर ने हिन्दू धर्म को बारूद लगा कर उड़ा देने की बात कही हो उनको हिन्दुत्व का प्रचंड समर्थक कहने का मेरा अभिप्राय क्या है?
    डॉ. भीम राव जी अंबेडकर पहले भारतीय हिन्दू विचारक थे जिन्होंने एक अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के आधार पर हिन्दू धर्म को दृढ़ करने की विचारधारा सामने रखी। डॉ. भीम राव जी अंबेडकर का प्रबल आग्रह था कि हिन्दू धर्म की लाइसेन्सदारी लिए हुए नेता, धर्म को संकीर्ण ना बनाएँ, उसकी व्यवस्था को थोड़ा लचीला करें। उसे उदारवादी बनाएँ, उसमें साफ और ताजी हवा आने दें। धर्म को री-पैकेज करें।
    हिन्दू समाज से जातीय समस्या लुप्त कराने की दिशा में सार्थक कदम : 
    ‘सनातन समाज’ आज के, वर्तमान हिन्दू समाज से इतर एक वैकल्पिक समाज की संरचना प्रतीत होती है जिसने हिंदुओं के तथाकथित निम्न वर्ण और उसकी बुराइयों को छोड़ उसे आत्मसात कर लिया है। यह एक ऐतिहासिक और अद्भुत सोच है। 
    सादर,

    सुधेन्दु ओझा

    पढ़ें अवश्य.......

    No comments:

    Post a Comment