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    (सम-सामयिक विषयों की मासिक पत्रिका, RNI No.-50756)

    Sunday, 5 March 2017

    दिल्ली के अद्भुत बाज़ार : सुधेन्दु ओझा



    दिल्ली के अद्भुत बाज़ार :



    दिल्ली बहुत बड़ा शहर है। जापान की राजधानी तोक्यो के बाद वर्ष 2014 में दिल्ली दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर बन गया, जिसकी आबादी 1990 के बाद दोगुने से अधिक बढ़कर लगभग 2.5 करोड़ तक पहुंच गई।
    दिल्ली कम से कम 2030 तक दुनिया का दूसरी सबसे अधिक आबादी वाला शहर बना रह सकता है जबकि इसकी आबादी तेजी से बढ़कर 3.6 करोड़ तक पहुंच जाएगी।
    दिल्ली में सामानों की बिक्री के तीन सामूहिक बाज़ार परस्पर एक साथ लगते हैं।
    किसी भी रविवार, डिलाइट सिनेमा से दरियागंज टेलीफोन एक्सचेंज और फिर नेताजी सुभाष मार्ग के बाएँ बाजू (गोलचा सिनेमा की तरफ) से जामा मस्जिद और फिर वहाँ एनडीएमसी कर पार्किंग के सामने तक फैला बाजार अपने आप में बहुत कुछ समेटे हुए है। इस पूरे क्षेत्र में हजारों की संख्या में दूकानदार और लाखों की संख्या में तैरते दिल्लीवासी अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ खरीदते आपको मिल जाएंगे।

    डिलाइट सिनेमा, दिल्ली स्टॉक एक्सचेंज (अब दिवंगत), के बरामदे से लेकर लगभग गोलचा सिनेमा के कुछ आगे, लकड़ी के पुल तक शायद एशिया का सब से बड़ा पुस्तक मेला हर रविवार सजता है। जिस किसी रविवार बारिश हो जाए तो समझिए कि लाखों लोगों का दिल टूट जाता है। ऐसा लगता है कि भारत-पाकिस्तान का वह क्रिकेट मैच रद्द होगया जिसमें भारत की जीत पक्की थी।
    मैं अपने स्कूली दिनों से इस बाज़ार को देख रहा हूँ। छोटे बच्चे थे तो जेब खर्च के पैसे बचा कर यहाँ आते थे। खूब सारी अमर चित्र कथा, चंदामामा खरीद कर लेजाते थे। बड़े हुए तो पाठ्य पुस्तकों को यहाँ तलाशने लगे।
     
    कुछ और बड़े हुए तो अङ्ग्रेज़ी के उपन्यास यहाँ से खरीदने लगे।
    इत्तेफाक से मुझे कोलकाता और मुंबई के इस प्रकार रविवार की तरह सजनेवाले पुस्तक बाज़ारों को देखने का भी सौभाग्य मिला है किन्तु आपको शर्तिया बता रहा हूँ जिस तरह की वेराइटी दिल्ली के बाज़ार में है वैसी वहाँ नहीं है। इस पुस्तक बाज़ार में आपको हर विषय की पुस्तकें मिलेंगी। प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे हैं तो दरियागंज चौराहे के इर्द-गिर्द देखिए। आर्किटेक्चर पर एम्बेस्डर होटल के नीचे, प्राइमरी स्कूल की पुस्तकें-गोलचा सिनेमा के पास। अङ्ग्रेज़ी-हिन्दी गल्प साहित्य और पत्र-पत्रिकाएँ तो हर तरफ।
    शर्मा जी घड़ियों के सा

    दरियागंज सब्जीमंडी से पुराने कपड़ेवाले, भारोत्तोलन के वेट इत्यादि। लकड़ी के पुल तक पुरानी स्टैम्प और सिक्के।
    पुस्तक बाज़ार दरियागंज लकड़ी के पुल तक समाप्त होजाता है, आप को पता नहीं चलेगा, इस चौराहे से ही जूतों का बाज़ार शुरू हो जाएगा। हर प्रकार के जूता चप्पल और सपोर्ट शूज। यहाँ सामान में कीमत तलाशिए, गुणवत्ता नहीं। दुकानदार से कीमत पूछिएगा तो वह हज़ार रुपए कहेगा। फिर आप से पूछेगा कि आप कितना देंगे। ग्राहक यहीं फँसता है।
    कच्चे ग्राहक हज़ार रुपए सुन कर सोचते हैं इसे छः-सात सौ बोल देता हूँ। आप के मुंह से जैसे ही छः-सात सौ निकलेंगे, दुकानदार आपको कहेगा, ‘लाइए पैसे निकालिएऔर सामान पन्नी में लपेट कर आपको थमा देगा।
    शर्मा जी और उनका असबाब

    कुशल से कुशल और अनुभवी पुराने खरीददार भी यहाँ गच्चा खा जाते हैं।
    ध्यान कीजिए यहाँ आप कुतूहल वश खरीददारी करने आए हैं। जो सामान आप खरीद रहे होंगे शायद वह आपके लिए आवश्यक भी ना हो, पर वहाँ दिखाई पड़ जाने से आप मन ही मन खुद को समझाते हैं कि यह वस्तु मेरे लिए उपयोगी हो सकती है।
    कुछ चाहिए तो नहीं?
    अतः ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि आप एक बार फिर सोच लें कि जो वस्तु आप खरीदने जा रहे हैं वह आप केलिए उपयोगी है भी अथवा नहीं। दुकानदार जिस वस्तु केलिए हज़ार रुपए बोल रहा है, होसके तो उसका उत्तर मत दीजिए। अगर उत्तर देते भी हैं तो ऐसा दीजिए जिसे सुन दुकानदार स्वतः माना कर दे। पर यह उत्तर क्या हो?
     
    आप खुद को सुरक्षित रखते हुए सौ या डेढ़ सौ रुपए ही बोलिए, ध्यान कीजिए यहाँ महंगी वस्तुओं के खरीददार नहीं आते।
    पत्थर, सिक्के, बहुत कुछ

    मैंने देखा एक सज्जन अपनी पुत्री के साथ थे, चमड़े के बड़े बैग के लिए दुकानदार से झक-झक कर रहे थे। उनकी पुत्री बार-बार उन्हें खींच के कह रही थी पापा! चलिए ना। इस बैग का क्या करेंगे?’
    अंततः, पिता को पुत्री की बात समझ आ ही गई, वे बैग छोड़ कर चल दिए।
    जूते-चप्पल का यह बाज़ार दरियागंज चौराहे से जामा मस्जिद की तरफ बढ़ता है, पुराने कपड़ों के दूकानदारों के बीच यह कब लुप्त हो जाता है आपको पता ही नहीं चलेगा।

    धीरे-धीरे आप जमा मस्जिद में पक्षियों के बाज़ार तक हुंच जाते हैं। यहाँ से बाएँ मुड़ेंगे तो आपको एक नया सा बाजार दिखाई देगा। पुराने लोहे के औज़ार, बिजली के स्विच, पुराने रेडियो, तवे वाले रेकॉर्ड प्लेयर, बाथरूम फिटिंग, पानी की मोटर।

     
    यहाँ पर भी कबूतर, मुर्गे और अन्य दुर्लभ पालतू पक्षियों का बाज़ार है।

    यहाँ घूमते हुए आप हर घड़ी दस रुपए में।भी सुन पाएंगे। आगे शर्मा जी और पंडित जी भी कलाई घड़ी बेचते हुए मिलेंगे। कलाई घड़ी वाले तो बहुत बैठते हैं किन्तु मेरा परिचय शर्मा जी और पंडित जी से ही है।
    पंडित जी वयो वृद्ध हैं। बहुत वाक-पटु।
    ये घड़ी बीस रुपए की खरीद है। पचास रुपए की बेच है। तीस रुपए की डकार है।मैं इन्हें डकार वाले पंडित जी कहता हूँ। सब से बात करने का उनका यही अंदाज़ है।
    कोई भी घड़ी उठा कर उनसे उस की कीमत पूछिएगा तो वो उसका मूल्य यूं बताएँगे पचास रुपए की खरीद है, अस्सी रुपए की बेच है। तीस रुपए की डकार।उनका मुनाफा ही उनकी डकार है।
    पुरानी मेकैनिकल घड़ी यदि चाहिए तो डकार वाले पंडित जी और शर्मा जी से वह साठ-सत्तर रुपए में मिल जाती है। क्वार्ट्ज़ घड़ी लगभग सौ रुपए में ये दोनों सज्जन दे देते हैं। आप चाहें तो चालीस रुपए से साठ रुपए में घड़ी की पूरी मशीन भी बदलवा सकते हैं।
    यहाँ से बाहर निकलते ही जामा मस्जिद का एनडीएमसी कार पार्किंग है। पहले घंटे केलिए बीस रुपया और तत्पश्चात हर घंटे केलिए दस रुपया अधिक। गाड़ी निकालिए और फुर्र से घर पहुंचिए, तीन-चार घंटे के पाद-भ्रमण से क्षुधा जागृत हो गई होगी.........
    मैं आज चालीस रुपए के पुराने, भारतीय सिक्के खरीद कर लाया हूँ और तीस रुपए पार्किंग के लिए देकर आया हूँ.....

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