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    (सम-सामयिक विषयों की मासिक पत्रिका, RNI No.-50756)

    Wednesday, 1 March 2017

    श्रीकांत वर्मा : अभिषेक वर्मा और संस्कार


    श्रीकांत वर्मा : अभिषेक वर्मा और संस्कार

    छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डाक्टर रमण सिंह का हालिया बयान कि 'पुत्र के किये की सज़ा उसके पिता को भी मिलनी चाहिए क्योंकि वही रक्त में उसे अपने अवगुण प्रदान करता है.' ठहर कर कुछ सोचने पर विवश करता है. इतना तो पक्का है कि न्यायविद, इसे सिरे से खारिज कर देंगे या यूं कहूं कि इस पर तवज्जो ही नहीं देंगे किन्तु सामाजिक परिवेश के अध्ययनशील छात्रों के मनन के लिए शायद यह मात्र बयान ही ना हो, एक गंभीर विचार हो. स्वर्गीय राजकपूर ने इस विषय को अपनी फिल्मों में अपनाया, किन्तु फिल्मों में उनका कथन यही रहा कि 'बुरे व्यक्ति की संतान बुरी ही हो यह आवश्यक नहीं है. मैं इस बयान के पक्ष-विपक्ष में जाने से पहले यह बता दूं कि इधर जब-जब नेवी वार-रूम लीक केस, हथियारों की खरीद में दलाली और अभिषेक वर्मा और उसकी रोमानियन पत्नी की गिरफ्तारी के बारे में पढ़ता-सुनता हूँ तो स्वर्गीय श्रीयुत्त श्रीकांत वर्मा की याद ज़रूर चली आती है. आखिर श्रीकांत वर्मा जैसे संवेदनशील और समर्थ कवि की विरासत इतनी कमज़ोर क्यों निकली कि वह उनके अपने पुत्र अभिषेक वर्मा को छू भी नहीं पाई? साहित्य और समाज को युद्धों और साम्राज्यों की व्यर्थता का सन्देश देती, संवेदनशील कविताओं के रचयिता कवि श्रीकांत वर्मा का बेटा अभिषेक वर्मा इन दिनों हथियारों की दलाली के आरोप में अपनी पत्नी के साथ पुलिस की हिरासत में है. क्या श्रीकांत वर्मा ने कभी सोचा होगा कि उनका बेटा एक ऐसे संदिग्ध पेशे में जाएगा जिसका प्रतिरोध जीवन भर उनकी कविता करती रही? चाहें तो कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी जिंदगी जी थी और उनका बेटा अपनी ज़िन्दगी जी रहा है. फिर, यह पिता और पुत्र के बीच का मामला है जिसमें कवि को घसीटा नहीं जाना चाहिए. लेकिन यह विडंबना फिर भी अलक्षित नहीं रह जाती, वह एक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ जाती है कि श्रीकांत वर्मा जैसे संवेदनशील और समर्थ कवि अपने पुत्र को संस्कार की क्या थाती पकड़ा गए. 

    'अच्छे पिता की संतान अच्छी ही होगी और बुरे पिता की संतान बुरी ही होगी' यह राजकपूर की फिल्मों की तरह सरल सा फ़िल्मी प्रश्न नहीं है बल्कि समाज विज्ञानियों के सामने जटिल प्रश्न है. यहाँ अनुचित नहीं रहेगा यदि हम एक अन्य हिंदी के प्रख्यात प्रातः स्मरणीय साहित्यकार स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन और उनके प्रख्यात बहुमुखी प्रतिभा संपन्न पुत्र अमिताभ बच्चन का यदि उल्लेख वर्तमान सन्दर्भों में करें. जिसने अपने पिता की संघर्षों से लड़ने की सीख को आलंबन बना, विषम परिस्थितियों में खतरनाक रास्तों से बचते हुए जीवन को अलंघ्य ऊंचाई तक पहुंचा पाने में में सफलता प्राप्त की.  यदि हम स्वर्गीय श्रीयुत्त श्रीकांत वर्मा की इस विडंबना की पड़ताल में उतरें तो हमें कई और विडंबनाएं दिखाई पड़ेंगी जो शायद इस बात की तरफ इशारा करें कि विरासत का सवाल इतना इकतरफा नहीं होता जितना कि वह लगता है. वह कई स्तरों पर चुपचाप बनता चलता है. क्या श्रीकांत वर्मा के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा? यह एक कठोर सा दिखनेवाला प्रश्न है, लेकिन ताज़ा हालात में पूछा जाना जरूरी है कि क्या स्वर्गीय श्रीयुत्त श्रीकांत वर्मा ने साहित्य या कविता को सांप-सीढ़ी के राजनैतिक खेल में सत्ता विमर्श की सीढ़ी तो नहीं बना लिया था. क्या स्वर्गीय श्रीयुत्त श्रीकांत वर्मा 'साहित्यकार' मुखौटा धारण कर राजनैतिक द्यूत क्रिया का भी आनंद भोगते रहे? कविता से वे पत्रकारिता तक पहुंचे और पत्रकारिता से राजनीति तक. वे इंदिरा गांधी के करीबी लोगों में बताए जाते थे और कांग्रेस के महासचिव तक बने. जाहिर है, सत्ता और शक्ति का एक खेल कवि को लुभाता-भरमाता रहा. इन्हीं सम्बंधों ने श्रीकांत वर्मा को भी कुछ ऐसी रहस्यमय पगडंडियों पर डाल दिया जिनपर वे अगली सुबह तक वे अकेले निकल पड़ते हों. क्या उनकी सुबह सार्वजनिक थी और रातें वैयक्तिक? जैकाल एवं हाइड? अभिषेक वर्मा पिता द्वारा रात की यात्राओं के छोड़े गए पदचिह्नों पर इतना आगे निकल गया कि उसे पिता के सुबह के सार्वजनिक जीवन का ख़याल ही नहीं रहा. इन्हीं खयालातों से मिलता-जुलता एक लेख अभी देखने का अवसर मिला जिसमें लेखक ने श्रीकांत वर्मा-अभिषेक वर्मा की विसंगतियों पर पैनी निगाह डालने का प्रयास किया है. लेख के अनुसार यह सच है कि कविता को उन्होंने कभी छोड़ा नहीं, अपने राजनीतिक सौदों और समझौतों के बीच वे अपनी विवशताओं का 'मगध' रचते रहे. लेकिन शायद यह सत्ता की, शक्ति की, हैसियत की विरासत थी जो श्रीकांत वर्मा से अभिषेक वर्मा तक गई. इस लिहाज से हम कह सकते हैं कि अंततः श्रीकांत वर्मा ने जीवन में जो कुछ किया, वह जीवन के स्थूल संबंधों में उनके सबसे करीबियों तक गया. शायद उन्हीं के रहते बने संबंध और संपर्क होंगे जिन्होंने अभिषेक वर्मा को उसके भविष्य का रास्ता दिखाया होगा. दुर्भाग्य से हममें से बहुत सारे लोग अपनी विरासत के साथ फिर वही अनजाना या सयाना खिलवाड़ कर रहे हैं जो श्रीकांत वर्मा ने किया या क्या पता, जिसे हम अभिषेक वर्मा का भटकाव कह रहे हैं, शायद उसका सयानापन पिता-पुत्र और परिवार को पहले से समझ में आ गया हो. आखिर कुछ दिनों की जेल और कुछ मुकदमों के बावजूद अभिषेक वर्मा एक साधन संपन्न व्यक्ति है जो दुनिया भर में घूमता है, वह हिंदी के कई बीहड़ कवियों के लाचार बेटों के मुकाबले-जिन्हें जिंदगी कहीं ज्यादा निर्ममता से पीस रही है-खुशकिस्मत है कि अंततः एक दिन छूट जाएगा और किन्हीं बैंकों में रखे अपने पैसे निकाल कर एक अश्लील और अय्याश जिंदगी का सुख भोगता रहेगा. लेकिन एक तरह से यह कविता की विफलता ही है- शायद उस तरह के संवेदनशील जीवन की भी जिसकी हम कामना करते हैं. हममें से बहुत सारे लोग, जो ज़िंदगी को उसकी तरलता और सरलता के साथ जीना चाहते हैं, जो अपने बहुत सारे अभावों या बहुत सारी विफलताओं के बावजूद इस बात से खुश रहते हैं कि उन्होंने समझौते नहीं किए या किसी गर्हित मूल्यहीनता के शिकार नहीं हुए,क्या इस तरह की निर्लज्ज धृष्टता से भरी जिंदगी जीना चाहेंगे? हम जो लिखते-पढ़ते हैं,जो रचते-गुनते हैं, आखिर उसका मकसद क्या होता है? बस इतना ही कि जिंदगी को उसकी स्थूलताओं के पार जाकर समझने की कोशिश करें, उसकी ढेर सारी छिपी हुई परतों को खोजें, उससे निकलने वाले रंगों से विस्मित और प्रमुदित हों, उसकी विडंबनाओं को भी पहचानें-जानें कि न्याय और बराबरी के बिना एक सुंदर दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती. अगर कविता और साहित्य अगर इतना भर मूल्यबोध हमें नहीं देते तो फिर वे व्यर्थ ही नहीं हो जाते, शक्ति और प्रदर्शन के हथियारों में और उनकी सौदागरी में बदल जाते हैं. फिर श्रीकांत वर्मा और अभिषेक वर्मा का फर्क मिट जाता है. लेकिन कविता बची रहती है. वह अपने कवि से छिटक कर दूर खड़ी हो जाती है. या फिर वह अपने उस कवि को धो-पोंछ कर निकालती है जो सफलता की गर्द में और सत्ता की चमक-दमक में कहीं खो गया था. श्रीकांत वर्मा के साथ शायद यही हो रहा है. जिस कविता को लिखकर वे जीवन भर अपने से दूर करते रहे, वही अब उनकी कीर्ति का कवच बनी हुई है. लेकिन इससे श्रीकांत वर्मा की निजी विडंबना कम नहीं होती- एक कवि और व्यक्ति के तौर पर उनकी वह विफलता जो साकार रूप में अभिषेक वर्मा के तौर पर हम सबके सामने है. दुर्भाग्य से हममें से बहुत सारे लोग ऐसे हैं जिनके लिए कविता-या वृहत्तर अर्थों में साहित्य- के सरोकार लगातार सत्ता और शक्ति के विमर्श में बदलते जा रहे हैं. यह अपनी विरासत के साथ फिर वही अनजाना या सयाना खिलवाड़ है जो श्रीकांत वर्मा ने किया. इसकी कुछ परिणतियां अब स्पष्ट हैं. लेकिन इसके बहुत सारे नतीजों से हम बेखबर हैं- क्या पता हमारी कविता भी हमारी जी हुई जिंदगी का मोल चुकाती हो? वह उतनी संवेदनसंकुल और प्राणवान न रह पाती हो जितनी हो सकती थी? क्या जिदंगी का अधूरापन हमारी कविताओं में भी दाखिल नहीं हो जाता है? लेकिन हम समझने को तैयार नहीं होते, श्रीकांत वर्मा भी कहां समझ पाए. जो रचा उसी से बचते रहे, यह लिखने के बावजूद कि जो बचेगा वह रचेगा कैसे? और बच कर रचेगा तो उसकी परिणति क्या होगी- यह उनकी विरासत का एक स्थूल रूप बता रहा है.
    मुझे मालूम है कि बहुत से पाठक ऊपर लिखी गयी बातों से हिंसक रूप से असहमत होंगे उनके पास सैंकड़ों दृष्टांत होंगे उदाहरण हेतु किन्तु फिर भी यह भी एक विचार ही तो है.

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