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    (सम-सामयिक विषयों की मासिक पत्रिका, RNI No.-50756)

    Sunday, 12 March 2017

    यूँ ही : टहल-पहल

    कल यानि 11 मार्च को प्रातः से ही उत्सुकता थी, चुनाव परिणाम वस्तुतः कैसा रहेगा? उत्तर प्रदेश (403 सीट), उत्तराखंड (70 सीट), पंजाब (117 सीट), गोवा (40 सीट) और मणिपुर (60 सीट)। 690 विधायक सीटों का निर्णय।
    चलिए कल सब कुछ कुशलता से निपट गया। भारतीय जनता पार्टी (80% सीट) केलिए उत्तर प्रदेश का जन-मत न भूतो-न भविष्यत

    पंजाब में आप को लात, उत्तराखंड में पुनः भारतीय जनता पार्टी के लिए 80% सीटों का जनमत, जन आकांक्षाओं पर खरा उतरना चुनौतीपूर्ण होगा। गोवा में 40 में से 13 सीटें ही भाजपा के पक्ष में आयीं, शायद मोदी जी को अपना एक क्षत्रप दिल्ली से भेजना पड़े। मणिपुर में भाजपा 0 से 21 सीटों तक पहुंची यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। 


    इन्टरनेट पर इन समाचारों से अवगत हो ही रहा था कि कूरियर आगया। 09 सितंबर 2016 को लोकसभा टीवी पर कश्मीर विषयक एक पैनल-डिस्कशन का कार्यक्रम था। लोकसभा टीवी से आज उस कार्यक्रम की सहभागिता राशि का चेक हस्त-गत हुआ।


    चेक के साथ जिस तरह का पत्र लगा था वह सम्मान-परक लगा। हम हिन्दी वाले हैं, कुछ न कुछ सुधार की गुंजाइश यहाँ भी निकाल लेते हैं।

    लोकसभा टीवी का पत्र



    लोकसभा टीवी यदि इसी संदेश को द्विभाषी कर देता तो मैं निरुत्तर हो जाता। आशा है इस पर शीघ्र ही संज्ञान लिया जाएगा। 




    लोकसभा टीवी

    रविवार को दरियागंज पुस्तक बाज़ार गया। जब दिल्ली रहता हूँ, यहाँ नियमतः जाता हूँ। जामा मस्जिद के सामने नगर-निगम की पार्किंग में कार खड़ी कर के। खरामा-खरामा टहलते हुए दरियागंज पहुँचा। 
    दरियागंज पुस्तक बाज़ार

    डैन ब्राउन की द लॉस्ट सिम्बल दिखलाई पड़ी। डैन ब्राउन बहुत बेहतरीन लेखक हैं। उनकी द एंजिल एंड डेमोन (शायद मैं ठीक ही लिख रहा हूँ) और द विंची कोड का जवाब नहीं। दोनों पर ही हॉलीवुड फिल्म बन चुकी है। 
    सुभाष चंद्र जी पुस्तक के साथ

    इतना गंभीर और शोध परक तरीके से लिखते हैं कि आप पढ़ कर चकित रह जाएंगे।
    हाँ तो मैं कह रहा था, मैंने यह किताब ज़िल्द में देखी। सुभाष चंद्र जी अपने स्टाल में इसे बेच रहे थे। मूल्य बहुत अधिक था। बहुत ही अधिक। आप पूछेंगे कितना? पहले मैं अङ्ग्रेज़ी उपन्यास कनॉट प्लेस की पटरियों से खरीदता था, इन किताबों के पाइरेटेड वर्जन दिल्ली में कहीं छपते थे। विक्रेता 200 रुपए मांगते थे किन्तु 100 रुपए में दे दिया करते थे, आज से 20 वर्ष पूर्व।
    आज जब सुभाष जी से पुस्तक का मूल्य पूछा तो उन्होंने कहा 100 रुपए किलो। पुस्तक तौली गई। 850 ग्राम निकली। उन्होंने मुझ से 70 रुपए स्वीकार किए। एकदम ओरिजिनल बैंटम प्रेस, लंदन, टोरंटो, सिडनी, ऑकलैंड, जोहानेसबर्ग 509 पृष्ठों की पुस्तक। हिन्दी पुस्तकें 150 रुपए किलो के हिसाब से थीं। सुभाष जी ने मेरी रुचि को देखते हुए मुझे पहली मंज़िल पर भेज दिया। 
    हरिनारायणओझा:पुस्तक विक्रेता

    यहाँ बहुत पुस्तकें अङ्ग्रेज़ी की मिलीं। पुस्तकें 400 रुपए किलो के भाव से थीं। पुस्तक विक्रेता हरिनारायण ओझा थे। ये अङ्ग्रेज़ी पुस्तकें 1940 से पहले की प्रकाशित थीं इसीलिए इनका मूल्य अधिक था। ओझा जी लखनऊ के थे। मुझे भी ओझा जान कर अपने पास बैठा लिया। 
    हरिनारायणओझा:पुस्तक विक्रेता

    जानकारी मिली कि पहले वे जैन बुक एजेंसी में काम करते थे, अब बच्चों ने काम को आगे बढ़ा लिया है। महीने में कई बार लंदन जाते हैं। उन्होंने शकरपुर, अशोक नगर, इंदिरापुरम, स्कूल ब्लॉक हर जगह मकान और ज़मीन खरीद ली है। यह भी बताया उन्होंने कि ओझा तीन कोटि के होते हैं। करैली, खैरी और निपन्हियाँ, वे खैरी थे। एक बार मैं स्वर्गीय राज नारायण जी को अस्सी के दशक में इंटरव्यू कर रहा था तो देसी घी में तले हुए चने चबाते-चबाते उन्होंने मुझ से भी पूछ लिया था “कौन ओझा हो?” मैंने हतप्रभ हो कर कहा था, करैली। राजनारायण जी कट्टर सोशियलिस्ट थे। थे तो भूमिहार ब्राह्मण (सिंह) पर जताते नहीं थे। आज दोबारा हरिनारायण जी को बताना पड़ा।   
    मैंने कुछ पुस्तकें लीं, उन्हों ने रियायत कर दी। अगली बार फिर आऊँगा यहाँ।


    वापस लौटते हुए, दरियागंज अंदर की तरफ मुड़ गया। सामने एंग्लो-संस्कृत स्कूल दिखलाई पड़ गया। 1977-78 में यहाँ त्रिपाठी जी खेल के मास्टर थे। क्रिकेट अच्छे कोच भी थे। इसी के थोड़ा आगे चल कर जैन अनाथाश्रम से सटा हुआ 

    रामजस विद्यालय,  दिल्ली कोल्ट्स उनकी प्रतिष्ठित टीम थी जो डीडीसीए लीग भी खेलती थी। चलिए छोड़िए यह किस्सा फिर कभी.....



    दिल्ली में आज वाहन से निकलना मुश्किल है.......हर चौराहे पर होलिका दहन की तैयारी.........

    आप सब को होली की अनंत शुभकामनाएँ.........
     

    सुधेन्दु ओझा

      
      

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