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    (सम-सामयिक विषयों की मासिक पत्रिका, RNI No.-50756)

    Wednesday, 8 March 2017

    डॉ शेरजंग गर्ग जी : संक्षिप्त मुलाक़ात

    आज अच्छी बात यह रही कि लगभग साढ़े ग्यारह बजे प्रातः डॉ शेरजंग गर्ग जी कार्यालय आगए। 

    जैसा कि मैं कई बार कह चुका हूँ और लिख चुका हूँ, डॉ शेरजंग गर्ग जी पिताजी के न केवल मित्र थे बल्कि उनके अग्रज भी।

    यह उनका पितृवत स्नेह ही है कि वे मुझ अकिंचन को सम्मान देने केलिए मेरे पास चले आते हैं।

    इधर उनका स्वास्थ्य, कम से कमतर होता जा रहा है। शुगर से काफी लंबे अरसे से उनका संघर्ष चल रहा है।
    बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उनका चौवालिस साल पुराना थीसिस बिजनौर के किसी प्रकाशक ने दोबारा छापा है।

    इधर वे खासे व्यस्त रहे। शायद 13-14 जनवरी को ज्ञानपीठ द्वारा कुछ पुस्तकों का विमोचन उनके द्वारा किया गया था।

    फिर उनके दुविधामय जीवन पर बात आ गई।

    अभी कुछ दिन पहले खेल-गाँव वाली डिस्पेन्सरी गया था, शुगर थोड़ी बढ़ी हुई थी। वहाँ डॉक्टर ने इंजेक्शन लगा दिए। शुगर बहुत नीचे आगया। उसी रात तबीयत बिगड़ गई। मंजू  (पत्नी) ने देखा तो फ्रिज से कुछ मिठाई निकाल लाईं। उसे खाया तो चैन पड़ा। वे बोले।

    रात ही उत्सव (पुत्र) का सिंगापुर से फोन आया। उससे बात हुई तो उसे लगा मेरी तबीयत कुछ खराब है, उसने अपनी माँ से बात की, फिर रातों रात मेरी समधन को चेन्नई फोन मिलाया। वो किसी चिकित्सा एनजीओ की प्रमुख हैं। उन्हों ने किसी डॉक्टर से बात की। पर अब ठीक हूँ।

    वृद्धावस्था का यह दुखद पहलू है। माँ-बाप सारी सुविधाओं के टापू में अकेले कैद हैं। उनके बच्चे एक ऐसे समुद्री जहाज की तरह हो गए हैं जो उस टापू को सुख-सुविधाओं से भर कर पुनः उस टापू पर नहीं आना चाहते। वे खुद को दायित्व-मुक्त समझ बैठते हैं।
    हम सब अपने बच्चों को इसीलिए इतना शिक्षित बनाते हैं?

    यह ऐसी त्रासदी है जिस से हम सब को दो-चार होना पड़ेगा।

    बात करते-करते उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आई। मैंने देखा है, जब भी पुत्र उत्सव का जिक्र करते हैं उनकी आँखें चमक उठती है। 

    उत्सव सप्ताह में चार दिन आस्ट्रेलिया और तीन दिन सिंगापुर में काम देखता है। जिस कंपनी में काम करता था उन्हों ने उसे अब पार्टनर बना लिया है। 

    उत्सव के दो बेटे हैं। सिंगापुर में बहुत आलीशान मकान है। एक मेड खाना बनाती है। दो मेड दोनों बच्चों को संभालती हैं। उत्सव की पत्नी सिंगापुर में ही यूनीलीवर की सीनियर डाइरेक्टर हैं।

     
    मुझे याद है वे दिन जब उत्सव शायद लखनऊ से इंजीनियरिंग करने के बाद आईआईएम-अहमदाबाद से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे।

    डॉक्टर गर्ग जी के साथ अगर मैंने श्री तपोधन स्वामी जी का नाम नहीं लिया तो यह अन्याय होगा। दुबले-पतले स्वामी जी ने रुड़की से इंजीनियरिंग की थी। साहित्यिक रुचि वाले हैं सो डॉ गर्ग जी से मित्रता स्वाभाविक ही थी। स्वामी जी भी यहीं हैं। इस लेख को पढ़ते ही नमूदार होंगे, ऐसा आप को यकीन दिलाता हूँ। 

    स्वामी जी डॉ गर्ग की आवाज़ की नक़ल ऐसे उतारते हैं कि क्या बताऊँ। आप उनके सामने बैठ कर आँख बंद कर लें और स्वामी जी गर्ग साहब की नक़ल उतारते हुए उनकी गजल पढ़ जाएँ तो आपको विश्वास ही नहीं होगा कि यह कमाल स्वामी जी कर रहे हैं।

    जब तक गर्ग जी ने नोएडा का अपना आवास नहीं बेचा था, दोनों ही हम-निवाला, हम-प्याला बने रहे। शेष उन दोनों मित्रों ने क्या-क्या किया यह मैं स्वामी जी के ऊपर छोड़ता हूँ। वे खुद इस पोस्ट पर अवतरित होकर डॉ गर्ग के साथ अपने किस्से को आगे बढ़ाएँगे। 

    शुरुआती दिनों में उत्सव को शायद गुरुग्राम में नौकरी मिली थी। उसे रोज़ नोएडा से गुरुग्राम आने-जाने में परेशानी होती थी। 

    डॉ गर्ग जी से पुत्र की यह कठिनाई देखी नहीं गई। उन्हों ने भरे मन से नोएडा का आवास बेच दिया।
    पुत्र ने कुछ पैसे का सहयोग किया तो पैंतीस-चालीस लाख का एक फ्लोर डिफेंस कॉलोनी में खरीदा। डॉ गीता आस्थाना से। डॉ गीता अस्थाना बीएचईएल में सीएमओ थीं। आजकल एस्कॉर्ट-फोर्टिस अस्पताल, दिल्ली में कार्य-रत हैं। डिफेंस कॉलोनी से
    उत्सव का गुरुग्राम तक सफर कुछ कम हो गया। पर परेशानी कम नहीं हुई। अंततः डॉ गर्ग जी को पुत्र उत्सव केलिए गुरुग्राम में ही शिफ्ट होना पड़ा।

    डिफेंस कॉलोनी से निकलते ही डॉ गर्ग का दिल्ली से संपर्क टूट गया। उनके सारे जानकार दिल्ली में छूट गए। जिस प्रिय पुत्र केलिए वे अपने संगी-साथी छोड़ कर गुरुग्राम के शहरी बीहड़ में बसे वह भी अच्छे कैरियर केलिए सिंगापुर जाकर बस गए। 

    अभी बहू के भाई की शादी चेन्नई में थी। दिसंबर में। हम दोनों यहाँ से चेन्नई गए। उत्सव और बहू सिंगापुर से सीधे वहीं आगए थे। विवाह कार्यक्रमों के बाद हम उनके साथ ही सिंगापुर चले गए थे। उन्हों ने मुसकुराते हुए बताया। 

    टेबल पर आया सूप पी चुके थे, तभी फोन आया कि ड्राईवर आ गया है। मैंने भोजन कर के जाने को कहा किन्तु वे नहीं माने। कार में बैठने पर जब पैर छूए तो बोले फोन कर लिया करो!

    29 मई 1937 को जन्मे डॉ शेरजंग गर्ग जी 80वें वर्ष में चल रहे हैं।

    ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखे और दीर्घायु करे ऐसी शुभकामनाएँ.....

    सुधेन्दु ओझा









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